Teachers TET Update : सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद देशभर में हजारों शिक्षकों के बीच चिंता और चर्चा का माहौल है। जो शिक्षक शिक्षा का अधिकार कानून यानी आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त हुए थे, वे अब शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से छूट की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब अलग नियम और योग्यताएं लागू थीं, इसलिए अब उन्हें नए नियमों के दायरे में लाना उचित नहीं है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बड़ा अभियान चलाया जा रहा है और केंद्र सरकार से न्याय की मांग की जा रही है।
संसद द्वारा कानून पारित कर छूट मिले
देशभर के शिक्षक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि संसद में कानून लाकर साफ प्रावधान किया जाए कि आरटीई से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से छूट दी जाए। उनका तर्क है कि वे पिछले 25 से 30 सालों से लगातार सेवा दे रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे चुके हैं। अगर इतने वर्षों की सेवा के बाद उन्हें परीक्षा देने के लिए बाध्य किया जाता है, तो इससे उनका मनोबल टूटेगा और शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। शिक्षकों का कहना है कि यह सिर्फ नौकरी का सवाल नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का भी मामला है।
शिक्षकों को क्या मिलेगी टीईटी से छूट?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इन शिक्षकों को राहत देगी या नहीं। कुछ राज्यों ने पहले ही TET को अनिवार्य करने की दिशा में कदम उठा दिए हैं। उदाहरण के तौर पर हरियाणा सरकार ने हाल में 50,000 से अधिक शिक्षकों के लिए TET पास करना अनिवार्य कर दिया है और तय समय तक परीक्षा पास न करने पर सेवा समाप्ति की चेतावनी दी है। इस फैसले के बाद अन्य राज्यों के शिक्षक भी चिंतित हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 1.86 लाख ऐसे शिक्षक बताए जा रहे हैं जिन्होंने अभी तक TET पास नहीं किया है, जिससे उनकी चिंता और बढ़ गई है।
यूपी के शिक्षकों के लिए नई चिंता
उत्तर प्रदेश की स्थिति थोड़ी ज्यादा जटिल नजर आ रही है। यहां करीब 30,000 शिक्षक ऐसे हैं जिनके पास TET में बैठने की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ही नहीं है। ऐसे में उनके सामने दोहरी चुनौती है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ रिव्यू पिटीशन भी दाखिल की है, लेकिन अभी तक इस पर सुनवाई नहीं हो पाई है। कोर्ट की ओर से पहले भी समय-सीमा दी जा चुकी है कि तय अवधि के भीतर TET पास करना जरूरी होगा। शिक्षक संगठन यह दलील दे रहे हैं कि जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर TET लागू नहीं होना चाहिए, क्योंकि उस समय यह नियम प्रभावी नहीं था।
शिक्षकों पर कैसे लागू हुई टीईटी?
साल 2009 में संसद द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया था और इसे 1 अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इस कानून का उद्देश्य 6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना था। इसके साथ ही शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में TET को अनिवार्य किया गया। जुलाई 2011 के बाद कई राज्यों में इसे सेवा शर्त के रूप में लागू कर दिया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ मामलों में यह कहा कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि शेष है, उन्हें तय समय में TET पास करना होगा। हालांकि इस आदेश को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग व्याख्याएं सामने आई हैं।
मामला अब संविधान पीठ में
यह मामला अब और गंभीर हो गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने पहले के कुछ फैसलों पर सवाल उठाए हैं और इसे संविधान पीठ को भेजा गया है। खासकर अल्पसंख्यक संस्थानों में TET की अनिवार्यता को लेकर पहले दिए गए फैसलों की भी समीक्षा की जा रही है। अभी संविधान पीठ का गठन नहीं हुआ है, लेकिन जैसे ही पीठ बनेगी, इस मामले में बड़ा फैसला आ सकता है। अगर संविधान पीठ कोई नई व्याख्या देती है, तो इससे देशभर के शिक्षकों पर असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर यह मामला अभी पूरी तरह से साफ नहीं है। एक ओर सरकार और कोर्ट शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए न्यूनतम योग्यता पर जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने शिक्षक अपने अनुभव और लंबे कार्यकाल के आधार पर छूट की मांग कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और न्यायालय इस मुद्दे का संतुलित समाधान कैसे निकालते हैं।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी और उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। टीईटी से संबंधित नियम, न्यायालय के आदेश और सरकारी निर्णय समय-समय पर बदल सकते हैं। सटीक और आधिकारिक जानकारी के लिए संबंधित राज्य सरकार या न्यायालय की आधिकारिक अधिसूचनाएं अवश्य देखें।









