1 मार्च से चेक बाउंस पर सख्त कार्रवाई – जानिए क्या कहता है कानून | Cheque Bounce Law

By Surpiya Ghosh

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Cheque Bounce Law : आज के डिजिटल दौर में भले ही UPI और नेट बैंकिंग का जमाना हो, लेकिन बड़े बिजनेस डील, प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन या किसी भरोसेमंद भुगतान के लिए आज भी चेक का इस्तेमाल खूब होता है। चेक देना मतलब सामने वाले को यह भरोसा देना कि आपके खाते में उतनी रकम मौजूद है और पेमेंट क्लियर हो जाएगा। लेकिन जब चेक बाउंस हो जाता है, तब मामला सिर्फ पैसे का नहीं रहता, बल्कि कानूनी झंझट भी शुरू हो जाता है। हर साल देशभर में लाखों चेक बाउंस केस कोर्ट में पहुंचते हैं, इसलिए इस कानून को समझना बेहद जरूरी है।

चेक बाउंस क्यों होता है और बैंक क्या सबूत देता है

सबसे आम वजह होती है खाते में पर्याप्त बैलेंस न होना। इसके अलावा गलत सिग्नेचर, ओवरराइटिंग, गलत तारीख, अकाउंट बंद होना या पेमेंट स्टॉप कर देना भी कारण बन सकते हैं। जब बैंक चेक को रिजेक्ट करता है तो वह एक आधिकारिक दस्तावेज जारी करता है, जिसे “रिटर्न मेमो” कहा जाता है। इसमें साफ लिखा होता है कि चेक किस वजह से बाउंस हुआ। यही रिटर्न मेमो आगे कोर्ट में सबसे अहम सबूत बनता है। इसलिए अगर आपका चेक बाउंस हुआ है तो इस दस्तावेज को संभालकर रखना बहुत जरूरी है।

किस कानून के तहत होती है कार्रवाई

चेक बाउंस का मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत आता है। यह एक आपराधिक अपराध माना जाता है। इस कानून का मकसद यह है कि कोई भी व्यक्ति जानबूझकर बिना पैसे के चेक जारी न करे। अगर कोई ऐसा करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इस धारा ने वित्तीय लेन-देन में भरोसा बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है।

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कानूनी प्रक्रिया कैसे शुरू होती है

अगर आपका चेक बाउंस हो गया है तो सबसे पहले बैंक से रिटर्न मेमो लें। इसके बाद 30 दिनों के अंदर चेक जारी करने वाले व्यक्ति को रजिस्टर्ड डाक से कानूनी नोटिस भेजना जरूरी है। इस नोटिस में साफ-साफ लिखा होना चाहिए कि आपको कितनी रकम चाहिए और किस चेक के बदले मांग की जा रही है। नोटिस मिलने के बाद सामने वाले को 15 दिन का समय दिया जाता है ताकि वह भुगतान कर सके। अगर वह इस अवधि में पैसा नहीं देता तो आप मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह शिकायत नोटिस अवधि खत्म होने के एक महीने के भीतर करनी होती है। समयसीमा का पालन न करने पर केस कमजोर पड़ सकता है।

दोषी साबित होने पर क्या सजा हो सकती है

अगर अदालत में आरोपी दोषी पाया जाता है तो उसे अधिकतम दो साल की जेल हो सकती है। साथ ही अदालत चेक की राशि के दोगुने तक जुर्माना भी लगा सकती है। कई मामलों में कोर्ट पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश भी देती है। हालांकि कई बार दोनों पक्ष आपसी समझौते से मामला सुलझा लेते हैं। कानून में समझौते की भी गुंजाइश रखी गई है ताकि लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचा जा सके।

क्या सच में 1 मार्च से कानून बदल गया है

अक्सर सोशल मीडिया पर यह दावा किया जाता है कि “1 मार्च से चेक बाउंस पर तुरंत जेल होगी” या “सुप्रीम कोर्ट ने नया कानून लागू कर दिया है।” सच यह है कि धारा 138 पहले से लागू है और इसमें कोई अचानक नया कानून नहीं आया है जो एक ही दिन में सबको जेल भेज दे। कोर्ट हर मामले की परिस्थितियों और सबूतों के आधार पर फैसला करती है। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन कानून को हल्के में लेना भी सही नहीं है।

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किन बातों का ध्यान रखकर आप बच सकते हैं

अगर आप चेक दे रहे हैं तो पहले यह सुनिश्चित कर लें कि खाते में पर्याप्त बैलेंस है। तारीख, रकम और हस्ताक्षर साफ-साफ लिखें। कभी भी खाली चेक या अधूरा चेक किसी को न दें। अगर किसी वजह से पेमेंट में देरी हो रही है तो सामने वाले को पहले ही सूचित कर दें। दूसरी तरफ अगर आपका चेक बाउंस हुआ है तो समय पर नोटिस भेजें और कानूनी प्रक्रिया का पालन करें। दोनों ही स्थिति में अनुभवी वकील की सलाह लेना समझदारी भरा कदम होता है।

क्यों जरूरी है इस कानून की जानकारी

चेक बाउंस सिर्फ पैसों का मामला नहीं है, यह भरोसे का मामला भी है। बिजनेस हो या पर्सनल लेन-देन, एक बाउंस हुआ चेक रिश्तों और प्रतिष्ठा दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि कानून ने इसे आपराधिक अपराध की श्रेणी में रखा है। अगर आप नियमों और समयसीमा का ध्यान रखते हैं तो आप बड़ी कानूनी परेशानी से बच सकते हैं।

Disclaimer : यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह नहीं है। चेक बाउंस से जुड़े मामलों में कार्रवाई करने से पहले किसी योग्य वकील से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें। कानून में समय-समय पर बदलाव संभव है, इसलिए आधिकारिक स्रोतों से नवीनतम जानकारी जरूर जांचें।

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